गुजरात के बनासकांठा की अवैध पटाखा फैक्ट्री में ब्लास्ट ने हरदा और देवास के 18 परिवारों को उजाड़ दिया। हंडिया (हरदा) स्थित फोकटपुरा गांव में 8 लोगों की मौत के बाद घर में मातम है तो, हर गली में आंसू। किसी ने अपनी मां खोई, किसी ने बेटा, तो किसी का पूरा प
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हर कोई मजदूरी के लिए गया था, लेकिन अब उनके घर सिर्फ चीखें बची हैं। सुबह से किसी भी घर का चूल्हा नहीं जला। चारों तरफ सन्नाटा, बस रोने की आवाजें। सभी 18 मृतकों का नेमावर में नर्मदा तट पर अंतिम संस्कार होगा। प्रशासन ने लकड़ियां जमा ली हैं। शवों को इंदौर के एमवाय अस्पताल की मर्चुरी में रखा गया था।
नाना का दर्द: अब मैं साइकिल किसे दिलाऊं…
“नाना में आऊंगा तो साइकिल लूंगा’ :12 साल के संजय की ये आखिरी शब्द थे, जो उसके नाना राधेश्याम नायक के कानों में गूंज रहे हैं। राधेश्याम को यकीन नहीं हो रहा कि उनका नाती संजय कभी लौटकर नहीं आएगा। संजय पहली बार अपनी मां बबीता और भाई धनराज के साथ मजदूरी करने गुजरात गया था। बबीता को पैसे कमाने थे, बच्चों के लिए भविष्य बनाना था, लेकिन ब्लास्ट में उसकी जिंदगी ही खत्म हो गई। अब नाना राधेश्याम की आंखें पथरा गई हैं।
“मैंने उसे जाने से रोका था, लेकिन वह मां के साथ चला गया… जाते समय बोला था कि लौटकर आऊंगा तो साइकिल लूंगा… अब मैं किसे साइकिल दिलाऊं? “संजय की मां बबीता मजदूरी करने पहली बार बाहर गई थी। पति संतोष अपनी मां का ऑपरेशन कराने शाजापुर गया था। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए बबीता ने पहली बार मजदूरी के लिए गुजरात जाने का फैसला किया।
लेकिन ब्लास्ट ने उसकी दुनिया ही उजाड़ दी। अब संतोष के पास न पत्नी है, न बच्चे। उसकी मां को अभी तक बहू और पोतों की मौत की खबर नहीं दी गई। “जब भाई लौटेगा, तो उसे कैसे बताऊं कि उसकी पत्नी और बेटे अब इस दुनिया में नहीं रहे?’ यह कहते हुए ननद अंगूरी बाई रो पड़ती हैं।
गीताबाई ने बेटी और तीनों नातियों को खोया
गीताबाई ने अपनी बेटी गुड्डी और तीनों नातियों अजय, विजय और कृष्णा को रोकने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन गुड्डी नहीं मानी। “घर के कर्ज़ को चुकाना था, मकान बनाना था… बेटों के लिए कुछ करना था… इसलिए वह चली गई,” यह कहते हुए गीताबाई की आवाज भर्राने लगती है। अब वह बस बदहवास सी घूम रही हैं। “मैंने मना किया था, लेकिन वह चली गई… अब सब खत्म हो गया…’।