After the hanging, the soldiers exchanged pieces of clothing with each other | फांसी के बाद कपड़ों के टुकड़े जवानों ने बांट लिए: चरित्र शंका में पत्नी-बच्चों को मारने की सजा, सिर्फ भास्कर में था आंखों-देखा हाल – Madhya Pradesh News

मध्यप्रदेश क्राइम फाइल्स के पार्ट 1 में आपने पढ़ा इंदौर सेंट्रल जेल में 4 अगस्त 1996 की रात थी। 42 वर्षीय उमाशंकर पांडे को फांसी देने की तैयारी शुरू की गई। वो मौत की आखिरी रात इसी काल कोठरी में गुजार रहा था। जेल की नियमावली के अनुसार फांसी का समय तय थ

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कोठरी से बाहर निकला उमाशंकर अब तक समझ चुका था कि यह रात उसकी आखिरी रात है। वह बाहर आया। मैला कुचैला लठ्ठे का कुर्ता-पायजामा, हड्डियों पर चढ़ा बस एक ढांचा, आंखों में गहराता खालीपन।

फांसी देने के लिए जल्लाद बालकृष्ण राव तैयार था। थुलथुल शरीर, सफेद बड़ी मूंछें, हाथ में रूमाल। रस्सी को जांचता, लीवर की सफाई करता और तीन बार प्रणाम करता। मानो कोई पूजा कर रहा हो।

इसी जेल में उमाशंकर पांडे को रखा गया था।

इसी जेल में उमाशंकर पांडे को रखा गया था।

उमाशंकर को फांसी क्यों दी गई, उसने क्या अपराध किया था? क्या उमाशंकर पांडे के चेहरे पर आखिर तक कोई पछतावा दिखा? फांसी और कपड़ों की परंपरा क्या थी? फांसी का आंखों देखा हाल किसने बताया?

पढ़िए क्राइम फाइल्स पार्ट-2 में…

फांसी को लाइव कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने बताया –

मैं उस समय दैनिक भास्कर इंदौर में सिटी चीफ था और न्यूज एडिटर प्रकाश हिंदुस्तानी थे। रात में करीब 2 बजे मुझसे पूछा गया कि फांसी की खबर आपने दे दी क्या? मैंने हिंदुस्तानीजी से कहा हां दे दी। फिर वो बोले- राणाजी फांसी देखना है। मैंने कहा कि सर संभव नहीं है। मैं और अन्य अखबारों के सिटी रिपोर्टर पिछले 15 दिन से कलेक्टर गोपाल रेड्‌डी के पीछे पड़े थे कि हमें फांसी का आंखों देखा हाल रिपोर्ट करना है। उन्होंने कहा भी था कि वो खुद सभी को अपने साथ जेल लेकर जाएंगे, लेकिन अचानक वे एक प्रशासनिक मीटिंग के लिए भोपाल चले गए।

एसपी देवेंद्र सिंह सेंगर थे। कुछ पत्रकारों ने उनसे बात की तो एसपी बोले- जेल में जाने की अनुमति जिला दंडाधिकारी (कलेक्टर) ही देते हैं। मैं अनुमति नहीं दे सकता। इसलिए बात आई गई हो गई।

फिर भी मुझे लगा कि कुछ करना चाहिए। ऑफिस के लैंडलाइन फोन से मैंने जेल में मेरे जेल प्रहरी मित्र को फोन किया। उससे कहा कि फांसी देखना है। उसने कहा कि मैं मदद नहीं कर सकता।

उसकी ड्यूटी जेल में मेन गेट पर थी। एक इंट्री गेट होता है, उसके बाद जेल का मेन गेट होता है। उसने कहा कि अगर तुम वहां तक आ जाओ तो मैं तुम्हें नहीं पहचानूंगा। मुझसे बात भी मत करना।

पत्रकार कीर्ति राणा ने भास्कर के लिए 29 साल पहले फांसी का आंखों देखा हाल रिपोर्ट किया था।

पत्रकार कीर्ति राणा ने भास्कर के लिए 29 साल पहले फांसी का आंखों देखा हाल रिपोर्ट किया था।

इस बीच एसडीएम प्रकाशचंद्र राठी पहुंचे। उन्हें फांसी की सारी कार्रवाई संपन्न करवानी थी। बरसों बाद इंदौर में फांसी दी जानी थी। भविष्य में होगी की नहीं ये सवाल भी था। तत्कालीन कुछ टीआई, सीएसपी, आरआई। ये सारे लोग फांसी देखने आए थे।

फांसी से पहले उमाशंकर के लिए आम और मिठाई लाकर रखी

जेल में अंदर घुसने के लिए मैंने वहां मौजूद एक जवान से कहा कि जवान साहब के लिए एक छाता दो। साहब यानी एसडीएम पीसी राठी। मुझे जवान ने छाता दिया और मैं एसडीएम पीसी राठी के पीछे छाता लेकर चलने लगा। फांसी होना थी तो जेल में चूने से लाइन बना दी गई थी। एक्स्ट्रा लाइट लगी थी। हल्की बारिश हो रही थी। जेल में अंदर-बाहर होने पर रजिस्ट्रर पर इंट्री होती है। मैंने भी साइन कर इंट्री की। मैं अब छाता लेकर एसडीएम राठीजी को रास्ते बताते हुए चलने लगा। जहां-जहां चूने से लाइन खींची हुई थी उस ओर इशारा करते हुए कहता- साहब! इधर चलिए। आगे टर्न है, यहां से चलिए। उन्हें लग रहा था कि ये जेल का व्यक्ति है। जेल वालों को लग रहा था कि ये साहब का पीए है। इस तरह फांसी स्थल तक पहुंच गए।

उससे पूछा आम खाओगे। उसने मना कर दिया। फिर पूछा कि मिठाई खाओगे, उसने दोबारा से मना कर दिया।

मरने वाले को गीता का 18वां अध्याय पढ़कर सुनाया जाता है। पंडितजी पन्ने में से पढ़कर उमाशंकर को सुनाने लगे। उमाशंकर शांत होकर खड़ा था, लेकिन पंडितजी के हाथ कांप रहे थे, क्योंकि वो उसे सुना रहे थे जो कुछ देर बाद मरने वाला है। इस बात की दहशत पंडितजी के अंदर थी।

भयावहता काे शब्दों में समेटना मुश्किल

इंदौर सेंट्रल जेल में 5 अगस्त 1996 की सुबह 4:57 से 5:30 तक का वक्त। घड़ी की सुइयां 4:57 पर आ चुकी थीं। जेल के फांसी घर के भीतर दीवारों से टपकती बारिश की बूंदें, बिजली की तेज रोशनी, और सन्नाटा- तीनों मिलकर एक ऐसी भयावहता रच रहे थे, जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है।

फांसी घर की दीवारों के बीच खड़ा था उमाशंकर पांडे- चेहरे पर नीला नकाब, दोनों हाथ पीछे गुलाबी नायलॉन की रस्सी से बंधे और पैरों में 25 किलो बालू की पोटली बांधी हुई। वह जानता था। अब बचने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन भीतर कहीं कोई छटपटाहट बाकी थी।

29 साल पहले भास्कर ने इस फांसी का आंखों देखा हाल पब्लिश किया था।

29 साल पहले भास्कर ने इस फांसी का आंखों देखा हाल पब्लिश किया था।

फांसी के बाद शरीर देर तक तड़पे तो वो जल्लाद का अपमान

जेल अधीक्षक राजाराम खन्ना, जेलर एसपी जैन, एसडीएम पीसी राठी, सीएसपी राजेश हिंगणकर, डॉक्टर बीएल निधान और शरद जैन, जल्लाद बालकृष्ण राव और 40 से अधिक अधिकारी-कर्मचारी फांसी घर में खामोशी से खड़े थे। सबकी घड़ी 4:57 पर सेट की जा चुकी थी।

जल्लाद ने फांसी की रस्सी को आखिरी बार खींचकर देखा। गठान ठीक है या नहीं, झटका पड़ने पर गर्दन टूटेगी या नहीं- यह सब उसके अनुभव पर निर्भर था। फांसी देने के बाद अगर शरीर देर तक तड़पता रहे, तो रवायत के मुताबिक इसे जल्लाद के लिए अपमानजनक माना जाता है।

बालकृष्ण राव ने हाथ रूमाल से पोंछे, अपनी बड़ी-बड़ी सफेद मूंछों पर हाथ फेरा और लीवर के हत्थे को हल्के से खींचकर जांचा – सब ठीक था।

उमाशंकर कुछ सुनने की कोशिश करता है… शायद अंतिम बार भगवान का नाम लेना चाहता है…

लेकिन…

‘खट!’– जब लीवर गिरा…

जेलर जैन ने जल्लाद की ओर देखा…

हाथ से इशारा हुआ।

जल्लाद ने बिना समय गंवाए लीवर का हत्था खींच दिया।

‘खट’…

लोहे की प्लेट उमाशंकर के पैरों के नीचे से खिसकी। वह एक झटके में नीचे लटक गया।

और अगले ही पल हवा में झूलती देह, झूलती रस्सी…!

फांसी की प्रक्रिया पूरी, अब बस इंतजार

उमाशंकर का शरीर अब कोठरी के नीचे झूल रहा था। रस्सी हवा में डोल रही थी। फांसी के बाद की जेल मैनुअल की प्रक्रिया शुरू हो गई।

जेल नियमावली के मुताबिक फांसी के बाद कम से कम आधे घंटे तक शव को फंदे से लटकाए रखना आवश्यक है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मृत्यु हो चुकी है। फांसी घर में खड़े अधिकारी एकटक रस्सी को देख रहे थे, जैसे अब भी किसी हरकत की उम्मीद कर रहे हों।

उन्हीं जवानों की आंखों में एक अलग-सी नमी थी, जिन्होंने कुछ मिनट पहले उसे नहलाने की कोशिश की थी, कपड़े पहनाए थे, पकड़कर चबूतरे तक लाए थे। वे अब चुपचाप एक-दूसरे को देख रहे थे।

शव उतारने की प्रक्रिया और चुप्पी का अंत

आधे घंटे बाद 5:30 बजे डॉक्टरों को नीचे कोठरी में ले जाया गया। डॉ. निधान और डॉ.शरद जैन ने फांसी के निशान, धड़कन, सांस, आंख की पुतली की जांच की।

रिपोर्ट स्पष्ट थी – “मृत्यु हो चुकी है।”

अब नीचे झूलती देह को उतारा गया। शव को स्ट्रेचर पर रखा गया।

फटे कपड़े और आखिरी इंसानियत

कोठरी के एक कोने में पड़े उमाशंकर के फटे कपड़े जो फांसी से पहले बदले गए थे। अब जवानों ने एक-दूसरे में बांट लिए थे। यह परंपरा थी। फांसी पाए कैदी के कपड़े को अपशगुन न समझते हुए, उसका एक हिस्सा संभाल लेना।

शव अब जेल के मुख्य गेट पर लाया गया, जहां बाहर खड़े कुछ रिश्तेदार प्रतीक्षा कर रहे थे।

जेलर जैन ने शांत स्वर में कहा – “इसे ले जाओ।” कोई आंसू नहीं, कोई चीख नहीं, बस बारिश की बूंदें गिरती रहीं।

इसलिए मिली थी फांसी की सजा

उमाशंकर पांडे उज्जैन के तराना तहसील के गांव लक्ष्मीपुरा का रहने वाला था।

मामले में आरोपी उमाशंकर को फांसी की सजा मिली। फांसी से माफी के लिए उमाशंकर ने अपील भी की, लेकिन वो निरस्त हो गई।

कानूनी औपचारिकताएं और बंद फाइल

अंतिम रूप से, फांसी की पूरी कार्रवाई का दस्तावेज तैयार किया गया। ब्लैक वॉरंट पर सभी अफसरों के हस्ताक्षर हुए।

एक पंक्ति जो हर किसी को भीतर से हिला गई। “उपस्थित अधिकारियों की पुष्टि के अनुसार, कैदी उमाशंकर पांडे को 5 अगस्त 1996 की सुबह 5 बजे फांसी दी गई। मृत्यु की पुष्टि डॉक्टरों ने की। संपूर्ण प्रक्रिया जेल नियमावली 475 और 778 (6) डी. के तहत संपन्न हुई।” फाइल बंद हुई।

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