16 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी
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नीरज पांडे की फिल्म औरों में कहां दम था, आज थिएटर्स में रिलीज हो गई है। फिल्म में अजय देवगन, तबु, सई मांजरेकर और शांतनु माहेश्वरी लीड रोल में हैं। रोमांस ड्रामा जॉनर वाली इस फिल्म की लेंथ 2 घंटे 25 है। दैनिक भास्कर ने फिल्म को 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है।
फिल्म की कहानी क्या है?
यह फिल्म दो प्रेमियों कृष्णा और वसुधा की है। कृष्णा का यंगर वर्जन शांतनु माहेश्वरी और वसुधा का सई मांजरेकर ने प्ले किया है, जबकि ओल्डर वर्जन में अजय देवगन और तबु की जोड़ी दिखी है। कृष्णा और वसुधा एक दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं। एक-दूसरे से बिछड़ने की बात पर भी सिहर जाते हैं।
अचानक दोनों की लाइफ में भूचाल आ जाता है। वसुधा से शादी का सपना देख रहा कृष्णा 25 साल के लिए जेल चला जाता है। अब कृष्णा जेल क्यों जाता है? जेल में उसकी लाइफ कैसी होती है, जेल से निकलने के बाद वो वसुधा से मिल पाता है कि नहीं, यह जानने के लिए आपको पूरी फिल्म देखनी पड़ेगी।

अजय देवगन और तबु की जोड़ी एक बार फिर पर्दे पर दिखी है।
स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है?
इस फिल्म का सबसे पॉजिटिव पॉइंट स्टारकास्ट की एक्टिंग ही है। अजय देवगन और तबु की जोड़ी ने हमेशा की तरह फिर से प्रभावित किया है। इनकी एक्टिंग इतनी संजीदा है कि जब भी दोनों स्क्रीन पर आते हैं, माहौल को इमोशनल छोड़ जाते हैं। कृष्णा और वसुधा के यंग रोल में दिखे शांतनु और सई मांजरेकर ने भी कमाल काम किया है।
सई ने सादगी से अपना किरदार निभाया है, वहीं शांतनु ने भी उनका भरपूर साथ दिया है। फिल्म में जिमी शेरगिल का एक कैमियो है, जो आपको पसंद आ सकता है।

डायरेक्शन कैसा है?
थ्रिलर फिल्में बनाने के लिए मशहूर नीरज पांडे ने पहली बार किसी रोमांटिक ड्रामा फिल्म पर काम किया हैै। उन्होंने एक्टर्स से उनका बेस्ट निकलवाया है, जो कि फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है। फिल्म को शुरुआत से लेकर अंत तक पोएटिक अंदाज में पेश करने की कोशिश की गई है।
हां, कहानी के बीच-बीच में थोड़ा संस्पेंस भी रखा है। नीरज की स्टोरी टेलिंग खूबसूरत है, लेकिन साथ में थोड़ी खिंची हुई भी लगती है। फिल्म को बेवजह लंबा बना दिया है। इस फिल्म को आराम से 2 घंटे में खत्म किया जा सकता था। शायद यही वो वजह हो सकती है कि दर्शक एक वक्त पर बोर महसूस करें।
फिल्म का म्यूजिक कैसा है?
एक्टिंग के बाद दूसरा मजबूत पक्ष इस फिल्म का म्यूजिक है। सारे गाने ऑस्कर विनर एम.एम. किरवानी ने कंपोज किए हैं। फिल्म के सारे गाने भावपूर्ण हैं, उनकी एक डीप मीनिंग है। सीक्वेंस के हिसाब से सारे गाने जंचे भी हैं। फास्ट म्यूजिक के जमाने में ऐसे सॉन्ग्स बनाने के लिए कंपोजर, लिरिक्स राइटर और सिंगर्स की तारीफ होनी चाहिए।

एम.एम किरवानी को RRR के गाने नाटू-नाटू के लिए ऑस्कर अवॉर्ड मिला था।
फाइनल वर्डिक्ट, फिल्म देखें या नहीं?
रोमांटिक ड्रामा वाली अधिकतर फिल्में एक हैप्पी नोट के साथ खत्म होती हैं। इस फिल्म में ऐसा नहीं है। ऐसा करके मेकर्स ने बड़ा रिस्क लिया है। हर बात में लॉजिक ढूंढने वाला आज का जेनरेशन कृष्णा के किरदार को बेवकूफ की भी संज्ञा दे सकता हैं, हालांकि यह उसके प्यार की प्योरिटी ही रहती है कि वो अपना सब कुछ कॉम्प्रोमाइज कर देता है।
फिल्म की कहानी ऐसी नहीं है जो पहले कभी नहीं देखी हो। लड़का, लड़की के प्यार में आकर अपने भविष्य के साथ समझौता कर लेता है, इस विषय पर कई फिल्में बन चुकी हैं। आपको फिल्म में कुछ भी नया देखने को नहीं मिलेगा। हालांकि नीरज ने इसे अपने अंदाज में पेश करने की कोशिश की है। कहानी वही है, लेकिन इसे दिखाने का अंदाज रिफ्रेशिंग है।
फिर भी आप कुछ एक्स्ट्रा की उम्मीद लगाए थिएटर जाएंगे, तो निराशा ही मिलेगी। हालांकि फिल्म देखने के बाद ऐसी भी स्थिति नहीं पैदा होगी कि आप अपना माथा पीट लें। कुल, मिलाजुला कर अगर आप रोमांटिक जॉनर की फिल्मों को पसंद करते हैं, तो एक बार इसके लिए सोच सकते हैं।