50 years of Sholay Javed Akhtar shared story | शोले के 50 साल, जावेद अख्तर बोले: स्क्रिप्ट में नहीं था मल्टीस्टारर प्लान, किरदार बनते चले गए; असल एंडिंग के साथ री-रिलीज होने पर हूं

39 मिनट पहलेलेखक: अमित कर्ण

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फिल्म शोले को रिलीज हुए आज 50 साल पूरे हो गए हैं। फिल्म ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचा, बल्कि दर्शकों के दिलों में भी छाप छोड़ी। इस खास मौके पर राइटर जावेद अख्तर ने दैनिक भास्कर खास बातचीत की और फिल्म से जुड़े किस्से शेयर किए।

सवाल: ‘शोले’ को भारतीय सिनेमा की पहचान कहना क्या अतिशयोक्ति होगी?

जवाब: देखिए, यह कहना शायद अतिशयोक्ति होगी कि ‘शोले’ ही भारतीय सिनेमा की एकमात्र पहचान है। लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि वह उन चंद यादगार फिल्मों में से एक है, जिन्हें आज भी बेहद सम्मान और स्नेह के साथ याद किया जाता है।

जैसे 1957 में आई प्यासा, 1960 की मुगल-ए-आजम, और फिर 1975 में शोले के साथ-साथ दीवार जैसी फिल्में भी थीं, जिसने काफी नाम कमाया था। लेकिन शोले का अपना एक अलग ही जादू है, इसमें कोई शक नहीं है।

सवाल: ‘शोले’ टाइटल कैसे आया था? क्या यह पहला और एकमात्र टाइटल था?

जवाब: नहीं, ‘शोले’ टाइटल का चुनाव एकमत से नहीं हुआ था। बहुत से लोगों को लगा था कि यह किसी एक्शन फिल्म का नहीं, बल्कि रोमांटिक फिल्म का नाम है। इसके अलावा एक बहुत पुरानी फिल्म ‘शोले’ नाम से आई थी जो नहीं चली थी। उसकी स्पेलिंग S-H-O-L-E थी। तब हमने अपनी फिल्म की स्पेलिंग S-H-O-L-A-Y रखी, ताकि यह अलग और प्रभावशाली लगे।

सवाल: इसे लिखने का विचार कैसे आया? क्या इसे एक बड़ी मल्टी-स्टारर फिल्म बनाने की पहले से योजना थी?

जवाब: जब हमने ‘शोले’ लिखना शुरू किया था, तो हमें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह इतनी बड़ी कास्ट की फिल्म बनेगी। हमारी कहानी तो बस एक ठाकुर और दो लड़कों पर केंद्रित थी। लेकिन जैसे-जैसे हम कहानी को विस्तार देने लगे, बाकी किरदार भी अपने आप सामने आने लगे। जय और वीरू की जिंदगी में बसंती और राधा, साथ ही जेलर, सूरमा भोपाली और मौसी जैसे किरदार भी कहानी का हिस्सा बन गए। इस तरह धीरे-धीरे स्क्रिप्ट बड़ी होती गई, जिसे हमारे प्रोड्यूसर जीपी सिप्पी और रमेश सिप्पी ने इतने बड़े स्केल पर बनाया कि उसकी उस जमाने में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

सवाल: क्या शोले को ‘सेवन समुराई’ या ‘मैग्निफिसेंट सेवन’ जैसी फिल्मों से प्रेरित कहा जा सकता है?

जवाब: यह सही है कि उस ज़माने में ऐसी कई वेस्टर्न फिल्में बनी थीं, जिनमें किसी गांव की समस्या को सुलझाने के लिए कुछ लोगों को काम पर रखा जाता था। कहीं पांच लोग होते थे, तो कहीं सात। हमने अपनी फिल्म में दो लोगों को रखा। तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उस ज़माने की वेस्टर्न फिल्मों का कुछ प्रभाव ज़रूर था। लेकिन इसके बावजूद, ‘शोले’ की पूरी स्क्रिप्ट ‘शोले’ की है, किसी अंग्रेजी फिल्म की नहीं। आपको कोई ऐसी अंग्रेजी फिल्म नहीं मिलेगी जिसमें बसंती, राधा, ठाकुर, गब्बर और जय-वीरू की यही कहानी हो। हम कह सकते हैं कि उस समय की फिल्मों का प्रभाव था, लेकिन ‘शोले’ अपने आप में एक अनूठी और मौलिक रचना है।

सवाल: किरदारों के नाम कैसे रखे गए? क्या इनके पीछे कोई खास कहानी थी?

जवाब: किरदारों के नाम आमतौर पर लेखक ही तय करते हैं, तो शोले के किरदारों के नाम भी हमने ही रखे थे। एक बार जब कोई किरदार गढ़ लिया जाता है, तो लेखक की ईमानदारी यही होती है कि वह उस किरदार के प्रति वफादार रहे।

सवाल: राइटिंग के दौरान सबसे दिलचस्प या चुनौतीपूर्ण हिस्सा क्या था?

जवाब: सबसे दिलचस्प और मजेदार हिस्सा गब्बर का किरदार लिखना था। उसकी बोलने की शैली, उसकी भाषा और उसके शब्द इतने अनोखे थे कि हर सीन लिखते समय मैं सोचता था कि अब वह क्या बोलेगा।

सवाल: क्या आप गब्बर के किरदार के जन्म के बारे में थोड़ा और बता सकते हैं कि वह कैसे बना?

जवाब: हमने दो चीजों को मिलाकर गब्बर का किरदार बनाया। पहली चीज, उस जमाने की हॉलीवुड की फिल्मों में मैक्सिकन काउबॉय डाकू होते थे, जिनके बोलने का अंदाज अजीब और अलग होता था। हमने उनका स्टाइल लिया। दूसरी चीज, हमने उसकी भाषा थोड़ी अवधी रखी, ताकि उसकी भाषा और शब्दावली बाकी किरदारों से अलग हो।

सवाल: वह सीन जिसमें ठाकुर के परिवार को मारा जाता है और एक-एक करके उनके चेहरे से कफन हटता है, उसे कैसे फिल्माया गया था?

जवाब: उस सीन को फिल्माने का श्रेय निर्देशक रमेश सिप्पी को जाता है। उन्होंने उस सीन को 21 दिनों में शूट किया था। उन्होंने तय किया था कि वे इस सीन को तभी शूट करेंगे जब आसमान पर बादल छाए हों और हल्की ग्रे रंग की रोशनी हो। इस तरह, सही रोशनी के लिए उस सीन को टुकड़ों-टुकड़ों में शूट किया गया था।

सवाल: क्या ‘शोले’ की दो एंडिंग शूट की गई थीं?

जवाब: हां, हमने दो एंडिंग शूट की थीं। इमरजेंसी के दौर में सेंसर बोर्ड ने कहा कि एक रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर, कानून को अपने हाथ में लेकर गब्बर को कैसे मार सकता है? तो हमें क्लाइमेक्स को दोबारा शूट करना पड़ा, जिसमें पुलिस आकर गब्बर को पकड़कर ले जाती है। मुझे उस एंडिंग से बहुत निराशा हुई थी, लेकिन अब यह सुनकर खुशी हुई है कि इस फिल्म को दोबारा ओरिजिनल एंडिंग के साथ दिखाया जाएगा।

सवाल: अमिताभ बच्चन साहब की कास्टिंग के बारे में बताएं। क्या यह रोल पहले किसी और को ऑफर हुआ था?

जवाब: जब अमिताभ बच्चन को कास्ट किया गया था, तब तक उनकी ‘जंजीर’ भी रिलीज नहीं हुई थी। उनकी स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी, लेकिन उनका टैलेंट हमें बहुत अच्छा लगा। हमें लगा कि उनसे बेहतर यह रोल कोई और नहीं कर सकता। कई बड़े एक्टर इस रोल के लिए उत्सुक थे, लेकिन हम बहुत खुश हैं कि अंत में अमिताभ बच्चन को ही चुना गया, क्योंकि उन्होंने जिस तरह का काम किया, वह अतुलनीय है।

सवाल: क्या आपको लगा था कि जया जी का विधवा किरदार और दोबारा शादी उस दौर के लिए आगे की सोच थी, और लोग इसे अपनाएंगे?

जवाब: देखिए, यह किरदार बाकी किरदारों से बिल्कुल अलग था। एक तरफ चुलबुली बसंती थी, वहीं दूसरी तरफ राधा का शांत और विधवा का किरदार था। ऐसा नहीं था कि यह चीज बिल्कुल नई थी। इससे पहले बीआर चोपड़ा साहब की फिल्म ‘एक ही रास्ता’ में भी एक विधवा विवाह दिखाया गया था और वह फिल्म भी बहुत सफल रही थी। हमने जानबूझकर यह किरदार इसलिए रखा ताकि कहानी में एक तरह का कंट्रास्ट आए और कहानी का असर और गहरा हो।

सवाल: ‘शोले’ बनाने में कितना खर्चा आया था?

जवाब: फिल्म की सही लागत तो मुझे याद नहीं है, लेकिन उस जमाने में यह बहुत ऊंचे बजट की फिल्म थी। बहुत से लोग जीपी सिप्पी साहब, जो इसके प्रोड्यूसर से कहते थे कि वे पागल हो गए हैं, इतने पैसे लगाकर वे फिल्म की लागत कैसे निकालेंगे? लेकिन उनका विजन बहुत बड़ा था।

सवाल: क्या ‘शोले’ का स्क्रीनप्ले 15 दिन में लिखा गया था?

जवाब: नहीं, ‘शोले’ को लिखने में काफी मेहनत लगी थी। स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स दोनों पर बहुत काम हुआ था। जब यह फिल्म रिलीज हुई, तब फिल्म इंडस्ट्री ने यह मान लिया था कि यह फ्लॉप होगी, लेकिन हमें अपनी फिल्म पर पूरा भरोसा था।

सवाल: जब ‘शोले’ रिलीज हुई तो क्या इंडस्ट्री को इस पर भरोसा था?

जवाब: नहीं, जब ‘शोले’ रिलीज हुई तो फिल्म इंडस्ट्री ने तो इसे फ्लॉप मान लिया था, लेकिन हमें अपनी फिल्म पर पूरा यकीन था। हमारा आत्मविश्वास इतना था कि हमने सलीम खान के साथ मिलकर पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन अखबारों में दिए थे, जिसमें हमने यह दावा किया था कि यह फिल्म जरूर चलेगी।

सवाल: उस जमाने में ‘शोले’ का सीक्वल या फ्रेंचाइजी बनाने के बारे में क्या सोचा गया था?

जवाब: उस समय सीक्वल या फ्रेंचाइजी का चलन नहीं था। वैसे भी, जय की मौत हो चुकी थी, तो फिर सीक्वल कैसे बनता? कहानी में जो हुआ, वह बहुत जरूरी था।

सवाल: फिल्म में अमजद खान के गब्बर के रोल के लिए पहले क्या कोई और एक्टर कास्ट किया गया था?

जवाब: हां, पहले उस रोल के लिए डैनी डेन्जोंगपा को कास्ट किया गया था। उनके कॉस्टयूम तक ट्रायल हो गए थे। लेकिन उनकी डेट्स की समस्या आ गई। वह फिरोज खान की फिल्म को कमिट कर चुके थे। उन्हें अफगानिस्तान जाना पड़ा। तब मैंने सलीम खान से अमजद खान का नाम सुझाया। दरअसल अमजद खान को मैंने शोले बनने से 10 साल पहले 1963 में एक यूथ फेस्टिवल में देखा था। फिर हमने उन्हें बुलाया, रमेश सिप्पी से मिलवाया और बाकी सब तो इतिहास है।

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